“मैं मृत्यु सिखाता हूं” नामक पुस्तक में ओशो कहते हैं कि जीवन को कलात्मक ढंग से जीना तो विश्व के मानवों की नैसर्गिक प्रक्रिया है, लेकिन जो कलात्मक ढंग से मृत्यु की भी तैयारी करता है। वह जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया से ऊपर हो जाता है, अर्थात् उसका आत्म साक्षात्कार हो जाता है या उसे कुछ इस तरह से भी कह सकते हैं कि वे ईश्वरत्व को प्राप्त कर लेते हैं। वैसे यह पंक्ति रामदास जी की एक लोकोक्ति के संदर्भ में याद आ गई। वे जब भी किसी सभा को संबोधित करते थे तब अपनी इस प्रिय लोकोक्ति को बोलते थे कि जिसकी गारंटी नहीं है वह है जिन्दगी और जिसकी गारंटी है उसका है नाम है मृत्यु। इसलिए जब तक जियो तब तक सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय जियो नहीं तो जिसकी गारंटी है, वह तो आएगी ही। इसमें स्व. रामदास अग्रवाल का संक्षिप्त जीवन परिचय है। जो कि यह बताता है कि व्यक्ति धन के कारण समाज में याद नहीं रखा जा सकता, वरन वह समाज के लिए कुछ कार्य करके जाता है, तो उसे ही समाज अपने स्मृति में याद रखता है।
